Sunday, June 3, 2012

ओके बोझ तु न समझ - रितेश मोहाबीर

ओके बोझ तु न समझ

रितेश मोहाबीर




दु दिन के ज़िन्दगी बा भय्या |
आगे खाई पीछे भी बा खाई,
दाँया बा खाई बाँया भी बा खाई,
संभल जो अब भी संभल जो |

नट जोन रस्सी पर चलत बा,
सहारा खाली एगो लकड़ी बा भय्या |
सहारा खाली एगो लकड़ी बा |

जीवन भर जे तोहरा सहारा देलक,
कबो कंधा पर लेके घोड़ा बनल,
कबो गोदी में लेके तोहरा झुलइलक,
उँगली पकड़के तोहरा जिन्दगी से परिचय करइ लक,
उ माँ-बाप के बोझ तु नँय समझ |

अरे ! जिन्दगी में जोन रफ्तार से तु आगे बढ़ल जाथवे
कदम कदम पर कबो दोस्ती अपन हाथ छुड़ा लेवेले,
कबो यार धोखा दे देवे ला |
लेकिन....
अपन नाम देवे होला माँ-बाप अभी तोर पीठ-पीछे खाड़ा बा |
ओके बोझ तु नँय समझ |


रहले लयका जब,
तोहर देख-भाल कर लक |
रात भर जाग-जाग के अपन खून जलई लक |
‘अरे ! पैसा आज बा काल नँय
हमर लइका त अच्छा रही’
ऐसन ओकर विचार रहल |
तोरा लेकोल भेज लक, कोलेज़-युनिवैसिते भेज लक,
पढ़ाई खातिर देस-विदेस भेज लक |

हउजा से लौटले त अपन घर वे में छोंच मरले !
अपन परिवार के काहे छोड़ले ?

दु गो कागज़ के प्रमाण-पत्र पर एतना घमंड ?
तोर भूल पर शायद भगवान माफ नँय करी,
लेकिन माँ-बाप....

आज कोय वकील बन गल बा, त कोय प्रोफेसर, डाक्टर बन गल बा,
बड़ा-बड़ा ओहदा पर, बड़ा-बड़ा घर में रहत बा,
उही बूढ़ा-बूढ़ी के कृपा रहल, उही बूढ़ा-बूढ़ी के कृपा अभी भी बा |


ओके बोझ तु नँय समझ !



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