Sunday, June 3, 2012

ऊ दिन, ऊ साँझ - गिर्जानन्दसिंह बिसेसर (अरविन्द)


ऊ दिन, ऊ साँझ
 गिर्जानन्दसिंह बिसेसर (अरविन्द)



कहाँ गइल ऊ दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ हो ?
चिरँय गावे, मीठा चहके, तब फजीरे किरिन फूटे,
मधवा बरसे कनवा भितरे, गाँव भर के सपना टूटे |
साँझे घामा तबे डूबे, जब चिरँया डाली पहुँचे
बैठ संघत सुर में अपन, सुखवा दुखवा मान बाँचे |
कहाँ गइल ऊ दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ हो ?


जीवन बाँधे रखे हमरो, बोल बिना गीत ऊ
बिसरा देवे सब दरदवा, ऐसन सच्चा मीत ऊ
अमवा के ऊ गाँछी में, अंगना के बसे प्रान हो
हमरो जिंगी ओलोग संगे, गावे एके तान हो
कहाँ गइल ऊ दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ हो ?

अंगना के ऊ हरियर गाँछ, आज गूँगा हो गइल बा
टूवर मान टुक-टुक देखेला, प्रान जैसे उड़ल बा
घामा उगेला आजो भैया, घामा डूबेला आजो हो
बासी लगेला अब किरिनवा, फजरो के आ साँझो हो
कहाँ गइल ऊ चिरँय भैया, कहाँ गइल ऊ गान हो ?
कहाँ गइल ऊ दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ हो ?





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