चिरँय गावे, मीठा चहके, तब फजीरे किरिन
फूटे,
मधवा बरसे कनवा भितरे, गाँव भर के सपना
टूटे |
साँझे घामा तबे डूबे, जब चिरँया डाली
पहुँचे
बैठ संघत सुर में अपन, सुखवा दुखवा मान
बाँचे |
कहाँ गइल ऊ दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ
हो ?
जीवन बाँधे
रखे हमरो, बोल बिना गीत ऊ
बिसरा देवे
सब दरदवा, ऐसन सच्चा मीत ऊ
अमवा के ऊ गाँछी
में, अंगना के बसे प्रान हो
हमरो जिंगी
ओलोग संगे, गावे एके तान हो
कहाँ गइल ऊ
दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ हो ?
अंगना के ऊ हरियर गाँछ, आज गूँगा हो
गइल बा
टूवर मान टुक-टुक देखेला, प्रान जैसे
उड़ल बा
घामा उगेला आजो भैया, घामा डूबेला आजो
हो
बासी लगेला अब किरिनवा, फजरो के आ साँझो
हो
कहाँ गइल ऊ चिरँय भैया, कहाँ गइल ऊ गान
हो ?
कहाँ गइल ऊ दिन भैया, कहाँ गइल ऊ साँझ
हो ?

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