Monday, June 4, 2012

दू शब्द - श्री गिरजानन्दसिंह बिसेसर (अरविन्द)


दू शब्द


मॉरिशस में भोजपुरी साहित्य के नींव तब पड़ल जब भारत से आवत आप्रवासी लोग के बोली, जोन जहाजी भाई-बहीन लोग हिन्द महासागर के बीच बोलत रहलन जा, अपन दुःख-सुख गा-गा के सुनावत रहलन जा, उ ई धरती के हवा में समा गइल, समुन्दर  के लहर संगे हैजा पहुँचल | ई बात सब कोय जानी ल जा कि भोजपुरी साहित्य वाचिक परम्परा के संगे हैजा आइल | ई धनी वाचिक परम्परा में उ सब लोक-गीत आवेला, उ सब खिस्सा, बुझौवल, लोकोक्ति आदि बा जोन हमनीं के बाप-दादा अपन संगे विरासत के रूप में अनलन जा |

मौखिक रूप से ई विरासत एगो पीढ़ी से दूसर पीढ़ी तलक बहते गइल, जहाँ-जहाँ एगो-दुगो पढ़ल-लिखल आप्रवासी लोग ई में से थोड़ा बहुत लिख लन जा |

दूसर भासा के साहित्य नियन, भारत में भोजपुरी साहित्य के एगो अपन लम्बा इतिहास बा | आदिकाल से लेके आधुनिक काल लेक भोजपुरी साहित्य अपन सफ़र तय करऽता | संत कबीर, अमीर खुसरो के भोजपुरी पद आज ले सुनेके मिलेला | भिखारी ठाकुर के ऊँच्च कोटि के भोजपुरी कविता औरु नाटक के आधार पर, भोजपुरी के शेक्स्पीयर मानल गइल बा | ई बात भी चाहेला जानेके कि बहुते ऐसन हिन्दी साहित्यकार बा जिनकर पर भोजपुरी के प्रभाव परल बा | आज ले भारत में भोजपुरी साहित्य लिखयते बा |  

ई सच बात ह कि जहाँ दूसर भासा के कविता लिखे होला ढेर कोय सामने अइलन जा, हौजे बहुते कवि लोग के कलम भोजपुरी कविता लिखेके नँय उठल | अपन मातृ-भासा में भाव उठल, विचार औरु प्रेरणा मिलल बकीर दूसर भासा में लिखल गइल | भोजपुरी भासा के मिठास, भोजपुरी माटी के गंध दूसर भासा में मिलल | ऐसन में भोजपुरी कविता एगो-दुगो मातृ-भासा प्रेमी तक ही रह गइल | हमनी के नतमस्तक होवे के चाहेला कि राष्ट्रीय कवि श्री ब्रजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’ जी के जे मॉरिशस के साहित्य में भोजपुरी कविता के स्थान दिययलन | उनकर ‘मधु कलश’, ‘मधु बहार’ औरु ‘मधुलिका’ भोजपुरी कविता के अमर संग्रह ह | फिर नारायणदत्त भीकी के ‘लोक संगीत गीत माला’, श्री दीमलाला मोहित जी के संग्रह, रुद्रदत्त पोखन के ‘भोजपुरी गीत माला’, आर्य रविवेद प्रचारिणी सभा देने से प्रकाशित भोजपुरी कविता संग्रह, श्री वासुदेव मोहन  के ‘गीत सुन्दरी’, श्री अभिमन्यु अनंत जी के सम्पादन में महात्मा गाँधी संस्थान देने से प्रकाशित ‘वसंत-भोजपुरी विशेषांक’, श्री दयानन्दलाल वसन्त रॉय जी के ‘सरल गीता’, डॉ सुचिता रामदिन के ‘संस्कार मंजरी’, डॉ मुनिश्वरलाल चिन्तामणी के भोजपुरी कविता, ई सब भोजपुरी कविता के छेत्र में काम होइल बा | ऑरु बहुते लोग भोजपुरी में लिखलन जा पर होय सकेला कि उ लोग के कविता सामने नँय आइल |

भोजपुरी कविता के बगिया में फिर से बहार आइल बा | एकरा मॉरिशस के भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एगो नवा जुग के शुरूआत सकल जाय बोले | महात्मा गाँधी संस्थान के भोजपुरी, लोक संस्कृति विभाग देने से ई भोजपुरी कविता संग्रह प्रस्तुत करल जात बा | एकर में मॉरिशस के जानल-मानल कवि लोग के कविता के रूप में आशीर्वाद बा त औरु नवा पीढ़ी के कवि लोग के भी कली अंकुरित होल बा |

महात्मा गाँधी संस्थान देने से सब कवि लोग के प्रति आभार प्रकट करत हँय जा औरु आशा बा कि ई भोजपुरी कविता संग्रह मॉरिशस के संगे-संगे दुनिया भर में, भोजपुरी साहित्य के विकास में चार चाँद लगाय | ई शुरूआत ह, आगे चलके भोजपुरी साहित्य के अन्य विधा के संकलन सामने आय, ई सब भोजपुरी भासा प्रेमी के संकल्प ह |

 
गिरजानन्दसिंह  बिसेसर (अरविन्द)
भोजपुरी लोक संस्कृति विभाग
महात्मा गाँधी संस्थान, मॉरिशस

दिनांक : २१.०५.२०१२                                          

2 comments:

  1. Replies
    1. बहुत धन्यवाद ! हम लोगों को ऐसे ही हौसला देते रहिये ताकि हम और से और अच्छा कर सकें !

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